नस्लें लगती है तब फसलें बनती है..!!
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बारिश से धो-धोकर..!!
सर पे उनको ढो-ढोकर..!!
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किसान की जान निकलती है..!!
अनाज वो मंडियों
में दुनुया पैरों तले कुचलती है..!!
पापी पेट का सवाल था..!!
सस्ते में बिका खुद का जो माल था..!!
कुछ खरीदने जो निकले
तो भावों में भारी उछाल था..!!
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खेतों में अकाल था
भाव थे बाजारों में
जब चुनावी साल था...!!
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सरकारें बदली
पर बदला ना
हमेशा से किसानो का जो हाल था !!!
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कौन कहता है मंडियों में फसल बिकती है
कोने में खड़े उन किसानो की बोली लगती है
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अनाज वो दुनिया पैरों तले कुचलती है...!!
खर्चा पहला पलदार का..!!
वजन कटता है फिर बोरी के भार का...!!
कुछ कमिशन ठेकेदार का...!!
भाव मिलता नहीं अख़बार का...!!
उपर से
खर्चा-पानी मण्डी के चौकीदार का...!!
क़र्ज़ बढ़ता जाये इस कर्जदार का...!!
हिसाब नहीं बनिए की उधार का...!!
उसमे भी आधा हिस्सा जमीदार का...!!
मौत शायद नाम ही की बुरी होती है
रोज मरता है वो
जिन्दगी पल-पल सिसकती है...!!
और
अनाज उसका
दुनिया पैरों तले कुचलती है !!!
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